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लॉकडाउन को लेकर केंद्र के ऐलान से पहले ममता ने खोला पश्चिम बंगाल, किए कई ऐलान

केंद्र सरकार लगातार मंथन कर रही है कि देश में लॉकडाउन को आगे बढ़ाना है या नहीं. लेकिन केंद्र सरकार किसी निर्णय पर पहुंचती उससे पहले ही पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल को लगभग-लगभग पूरी तरह खोल देने का ऐलान कर दिया है.



ममता बनर्जी ने किया धार्मिक स्थलों को 1 जून से खोलने का ऐलानपश्चिम बंगाल में 8 जून से सभी सरकारी कर्मचारी भी काम पर लौटेंगेश्रमिक एक्सप्रेस ट्रेन को लेकर ममता ने बोला रेल मंत्रालय पर हमला
देश में कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने 25 मार्च से देशव्यापी लॉकडाउन लागू किया था. भारत में लॉकडाउन कई चरणों वाला रहा. लॉकडाउन के पहले और दूसरे चरण में काफी सख्ती रही, लेकिन बाद के चरणों में थोड़ी-थोड़ी सहूलियतें भी दी गईं. अब लॉकडाउन 4 भी अपने अंतिम दौर में है. 31 मई को लॉकडाउन का यह चरण खत्म हो जाएगा. केंद्र सरकार लगातार मंथन कर रही है कि देश में लॉकडाउन को आगे बढ़ाना है या नहीं. लेकिन केंद्र सरकार किसी निर्णय पर पहुंचती उससे पहले ही पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल को लगभग पूरी तरह खोल देने का ऐलान कर दिया है.

शुक्रवार को कोरोना संकट को लेकर हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने राज्य में लॉकडाउन से जुड़े कई अहम फैसलों की घोषणाएं कीं हैं. ममता बनर्जी ने ऐलान किया है कि 1 जून से राज्य में सभी धार्मिक स्थल खोल दिए जाएंगे. यानी पश्चिम बंगाल में अब धार्मिक स्थलों में अब श्रद्धालुओं की भी एंट्री हो सकेगी. हालांकि इसके लिए कुछ नियम भी लगाए गए हैं. जैसे एक समय में सिर्फ 10 लोग ही जा सकेंगे और सैनिटाइजेशन की पूरी व्यवस्था इत्यादि. इसके अलावा राज्य में 8 जून से सभी सरकारी और गैर सरकारी दफ्तर भी खोल दिए जाएंगे, इसके लिए कर्मचारियों की कोई संख्या भी सीमित नहीं रखी गई है यानी सभी कर्मचारी अब ऑफिस जा सकेंगे.

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ममता बनर्जी ने इसके साथ ही प्रेस कॉन्फ्रेंस में राज्य के सभी राजमार्ग और जिले की सड़कों को भी दोबारा खोल देने की घोषणा भी की है. ममता ने इसके अलावा जूट इंडस्ट्री से भी जुड़ा एक अहम कदम उठाया है. ममता बनर्जी ने शुक्रवार के अपने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि एक जून से राज्य में जूट इंडस्ट्री को दोबारा खोल दिया जाएगा. जूट इंडस्ट्री में भी सभी कर्मचारियों को वापस काम पर जाने की छूट दे दी गई है. यानी स्कूल, कॉलेज और कोचिंग क्लास जैसी चीजों को छोड़कर पश्चिम बंगाल में लगभग सबकुछ खोलने का ऐलान कर दिया गया है. जबकि अभी लॉकडाउन के चौथे चरण के अंतिम दो दिन बचे ही हैं. और गृह मंत्रालय अभी इस बात पर मंथन कर रहा है कि लॉकडाउन 5 लागू करना है या नहीं.

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अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में रेलवे पर निशाना साधते हुए ममता ने कहा क्या श्रमिक एक्सप्रेस के नाम पर वे लोग इसे कोरोना एक्सप्रेस में बदलना चाहते हैं. आपके पास पर्याप्त क्षमता है. मैं भी रेल मंत्री रह चुकी हूं, मैं जानती हूं. अतिरिक्त ट्रेनें क्यों नहीं चलाई जा रही हैं. बोगियां बढ़ाइये, राज्य सरकार पूरा खर्च उठाएगी. अभी भी ये लोग अमानवीय परिस्थितियों में घंटों की तकलीफदेह यात्रा कर रहे हैं. श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेनों पर तंज करते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि गांव वाले इससे डर रहे हैं. वो कहते हैं कोरोना एक्सप्रेस आ गया.

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ममता बनर्जी ने प्रवासी मजदूरों का मुद्दा भी उठाया. उन्होंने कहा कि मुझे खुशी है कि प्रवासी मजदूर वापस आ रहे हैं. लेकिन मैं पूछना चाहती हूं कि बिना सोशल डिस्टेंसिंग के उन्हें ट्रेनों में क्यों पैक किया जा रहा है?? वे सभी हॉटस्पॉट... महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, दिल्ली... कहां से आ रहे हैं. इसलिए जब ट्रेनें इन्हीं स्थानों से आ रही हैं तो रेलवे अतिरिक्त ट्रेन क्यों नहीं चला सकती है, ताकि उनमें कुछ सोशल डिस्टेंसिंग बनी रहे. अपना हमला जारी रखते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि ट्रेन में तो खाना है न ही पानी है... इन प्रवासियों को गाड़ियों के अंदर पैक कर दिया जा रहा है. कभी-कभी क्षमता से दोगुना लोग बैठाए जा रहे हैं.


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Lockdown Diary: दिल्ली से पैदल जा रहा था बिहार, रास्ते में हुआ कुछ ऐसा कि बहू लेकर पहुंचा घर
दिल्ली (Delhi) से बिहार (Bihar) चले थे पैदल, घर की दहलीज से पहले मिली मोहब्बत की मंजिल


नई दिल्ली. लॉकडाउन (Lockdown) में हज़ारों लोग पैदल ही अपने घर जाने के लिए निकल पड़े हैं. कोई 500 किमी दूर जा रहा है तो कोई एक हज़ार किमी का सफर तय कर रहा है. इस दौरान कुछ ऐसा भी बीत रहा है जो ताउम्र याद रहने वाला है. ऐसे ही लोगों में से एक सलमान है. सीतामढ़ी, बिहार (Bihar) का रहने वाला सलमान दिल्ली (Delhi) से पैदल ही निकला था परिवार के साथ. लेकिन पलवल (Palwal) के बाद का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है.


आगरा (Agra) पहुंचकर किसी से मोहब्बत का इज़हार हुआ तो कानपुर से घर वालों के बीच तू-तू, मैं-मैं शुरु हो गई. लेकिन गोरखपुर (Gorakhpur) निकाह का गवाह बन गया. इस तरह से घर की दहलीज़ पर पहुंचने से पहले ही सलमान और शहनाज़ को मोहब्बत की मंज़िल मिल गई. लेकिन यह सब इतनी आसानी से नहीं हुआ. अपनी मोहब्बत के सफर को सलमान ने न्यूज18 हिंदी के साथ साझा किया. आइए सफर के इस किस्से को पढ़ते हैं सलमान की ही ज़ुबानी.

ना-ना करते भी घर से निकल आए पैदल

मैं ओखला में अपने मां-बाप और दो छोटे भाई-बहन के साथ रहता हूं. एक दुकान पर उर्दू टाइपिंग का काम करता हूं. जितनी टाइपिंग करो उतना ही पैसा मिलता है. पिता ओखला में ही चाय का ठेला लगाते हैं. लॉकडाउन के शुरुआती 20 दिन में ही घर में रखे सब पैसे खत्म हो गए. लंगर से लेकर खाना खाने लगे. फिर पिता एक लंगर का रिक्शा चलाने लगे. खाना लेकर दूसरे मोहल्लों में जाते थे. इसके बदले में खाने के साथ 100 रुपये भी मिलने लगे. लेकिन जल्द ही वो लंगर बंद हो गया.

तब तक हम दूसरे लोगों को पैदल जाते हुए देख रहे थे. लेकिन मैं और पिता इसके लिए तैयार नहीं थे कि अम्मी और भाई-बहन को लेकर पैदल चले. 18 मई को अचानक से हमने किराए का घर छोड़ दिया. ज़रूरी कपड़े और खाने का कुछ सामान लेकर हम सीतामढ़ी, बिहार के लिए चल दिए.


















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पलवल पर पहली बार देखा था शहनाज़ को

पलवल और बल्लबगढ़ के बीच एक जगह हम आराम कर रहे थे. तभी पिता को उनके एक दोस्त मिल गए. वो भी बिहार जा रहे थे. वो पिता के ठेले पर अक्कर चाय पीने आते थे. ओखला में ही रोजदारी पर मजदूरी करते थे. उनके साथ उनका परिवार भी था. उसी में 12वीं पास शहनाज़ भी थी. अब हम लोग साथ सफर करने लगे. कहीं भी रुककर साथ में ही खाना खाते और आराम करते. तभी मुझे महसूस हुआ कि खाने के वक्त शहनाज़ मेरा खास ख्याल रखती है.

जब मुझसे शहनाज़ ने कहा, ‘मुझे ताजमहल दिखाएंगे क्या’

मथुरा के बाद से हमने अपना रास्ता बदला और यमुना एक्सप्रेस वे पर आ गए. और फिर सीधे चलते हुए आगरा जाकर रुके थे. तभी शहनाज़ ने पूछा यह कौन सा शहर है. इस दौरान तक हम लोगों के बीच कोई खास बातचीत नहीं हुई थी. लेकिन पूरे रास्ते दोनों का ध्यान एक-दूसरे पर ही रहता था. शहनाज़ के सवाल का जवाब देते हुए मैंने कहा यह ताजमहल का शहर है. इसके बदले में शहनाज़ ने बस इतना ही कहा कि क्या आप कभी मुझे ताजमहल दिखाएंगे. इसी सवाल-जवाब के सिलसिले से मुझे एहसास हुआ कि हम दोनों एक जैसा ही सोच रहे हैं.

कानपुर से घर वालों के बीच लड़ाई शुरु हो गई

कानपुर पहुंचने से पहले ही मेरे और शहनाज़ के पिता अब पहले की तरह से बात नहीं कर रहे थे. चलते वक्त भी दोनों ने दूरी बना रखी थी. लेकिन असल वजह हमें कानपुर में समझ आई जब एक जगह हम लोग लंगर लेकर खा रहे थे. तब मैंने शहनाज़ के पिता को यह कहते हुए सुना कि मैं सब देख रहा हूं, बात तुम्हारे लड़के की तरफ से बढ़ी है. यही बात मेरे पिता ने पलटकर शहनाज़ के पिता को बोल दी. लेकिन मैं खामोश रहा. सही बात तो यह है कि कानपुर के बाद से दोनों की एक-दूसरे के ऊपर छींटाकशी रुकी नहीं और उल्टे बढ़ती चली गई.

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गोरखपुर में हमने घर न जाने का किया फैसला

वो रात का वक्त था जब हम गोरखपुर पहुंचे थे. तभी मुझे थोड़ी देर शहनाज़ से बात करने का मौका मिला था. इसी बात में हमने तय किया कि हम अपने घर बिहार नहीं जाएंगे. अगले दिन पिता ने दोस्त की तरफ इशारा करते हुए कहा हम इनसे पहले निकलेंगे और अब साथ में नहीं चलेंगे. लेकिन मैंने इससे इंकार कर दिया और कहा अब्बू साथ चलने से क्या फर्क पड़ता है. इस पर उन्होंने मुझे डांट दिया. तब मैंने कहा कि मैं शहनाज़ को लेकर ही जाऊंगा. और जब तक निकाह नहीं होगा मैं सीतामढ़ी नहीं जाऊंगा. यह बात शहनाज़ के पिता ने भी सुन ली थी. अब हम से पहले वो चलने लगे तो उधर शहनाज़ ने जाने से मना कर दिया.

लव जिहाद का मामला समझ गांव वाले जमा हो गए

मेरी और शहनाज़ की बात सुन घर वाले आग बबूला हो गए. दोनों की बातें सुन लंगर बांटने वाले भी आ गए. एक बार को उन्हें लगा कि यह कोई लव जिहाद का मामला है. लेकिन जब उन्हें पता लगा कि हम दोनों ही मुसलमान हैं तो वो शांत हुए. गांव वालों ने हम सबकी बात सुनी. वो भी शादी के लिए तैयार हो गए देर शाम तक मेरे और शहनाज़ के पिता भी मान गए. तब गांव वालों ने कहा कि अब आप यहां से कल जाना. रात आठ बजे गांव वाले एक हाफिज़ जी को बुला लाए.

लॉकडाउन की वजह से निकाह के लिए छुआरे तो मिले नहीं, लेकिन रमज़ान के चलते खजूर मिल गए और हमारा निकाह हो गया. गांव वाले निकाह के गवाह भी बने. दूसरे दिन गांव वालों ने मुझे और शहनाज़ को कपड़ों के साथ कुछ पैसे भी दिए. और कहा कि यह हमारे गांव की बेटी है. कई लोगों ने अपने मोबाइल नंबर भी शहनाज़ को दिया. बोले कि दोनों परिवार में से कोई भी बिहार




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